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अकलतरा थाना या ‘स्थायी पोस्टिंग सेंटर’? नौ साल से एक ही थाने में जमे प्रधान आरक्षक शरीफुद्दीन खान पर सिस्टम की चुप्पी!

आरक्षक से प्रधान आरक्षक तक का सफर: अकलतरा में ही पूरा—3 साल आरक्षक, 3 साल CCTNS प्रभारी और अब 3 साल से प्रधान आरक्षक

सूत्र पूछ रहे—तबादला नीति आखिर किसके लिए?

अकलतरा। पुलिस विभाग में पारदर्शी और संतुलित प्रशासन के लिए समय-समय पर अधिकारियों एवं कर्मचारियों की पदस्थापना और स्थानांतरण किया जाता है। लेकिन अकलतरा थाना इन दिनों एक ऐसी पदस्थापना को लेकर चर्चा में है, जिसने विभाग की तबादला व्यवस्था और प्रशासनिक निगरानी पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।

सूत्रों के अनुसार अकलतरा थाना में पदस्थ प्रधान आरक्षक शरीफुद्दीन खान, बैच नंबर 487, पिछले करीब नौ वर्षों से लगातार इसी थाने में पदस्थ हैं। खास बात यह है कि इस दौरान उनका पद और जिम्मेदारी जरूर बदलती रही, लेकिन कार्यस्थल नहीं बदला।

सूत्रों के मुताबिक शरीफुद्दीन खान ने अपने कार्यकाल के शुरुआती करीब तीन वर्ष आरक्षक के रूप में अकलतरा थाना में बिताए। इसके बाद लगभग तीन वर्ष तक CCTNS प्रभारी की जिम्मेदारी संभाली। वर्तमान में वे प्रधान आरक्षक के पद पर करीब तीन वर्षों से इसी थाना में पदस्थ बताए जा रहे हैं।

यानी करीब नौ साल—तीन जिम्मेदारियां—लेकिन थाना वही।

पद बदलता गया, पोस्टिंग नहीं बदली!

मामले को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर एक कर्मचारी की पदोन्नति अथवा जिम्मेदारी में बदलाव के बावजूद उसकी पदस्थापना लगातार उसी थाना में कैसे बनी रही?

सूत्रों के बीच चर्चा है कि पुलिस विभाग में जहां कर्मचारियों की पदस्थापना को लेकर स्थानांतरण और रोटेशन की प्रक्रिया अपनाई जाती है, वहीं अकलतरा थाना में प्रधान आरक्षक शरीफुद्दीन खान की लंबी पदस्थापना अलग ही तस्वीर पेश करती है।

यहां सवाल किसी कर्मचारी के कार्य या व्यक्तिगत क्षमता पर नहीं, बल्कि एक ही स्थान पर इतनी लंबी पदस्थापना की प्रशासनिक औचित्यता पर है।

नौ साल का सवाल—क्या विभागीय समीक्षा भी हुई?

यदि कोई कर्मचारी लगातार इतने लंबे समय तक एक ही थाना में पदस्थ है तो स्वाभाविक रूप से यह जानना जरूरी हो जाता है कि—

क्या उनकी पदस्थापना की समय-समय पर विभागीय समीक्षा हुई?

क्या जिले की स्थानांतरण नीति में लंबे समय से एक ही थाना में पदस्थ कर्मचारियों के लिए कोई रोटेशन व्यवस्था लागू है?

यदि ऐसी व्यवस्था है तो नौ वर्षों से एक ही थाना में पदस्थ कर्मचारी उस प्रक्रिया के दायरे में क्यों नहीं आए?

और सबसे बड़ा सवाल—

‘एक थाना, नौ साल’ की इस कहानी को आखिर किसकी प्रशासनिक मंजूरी मिलती रही?

सूत्रों का कहना है कि लंबे समय से एक ही स्थान पर पदस्थापना को लेकर पुलिस महकमे के भीतर भी समय-समय पर चर्चाएं होती रही हैं। हालांकि इस संबंध में विभाग की ओर से कोई आधिकारिक आपत्ति अथवा आरोप सामने नहीं आया है।

लेकिन सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या किसी कर्मचारी की एक ही थाना में इतनी लंबी पदस्थापना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है या फिर ऐसे मामलों के लिए कोई अलग मानदंड लागू होता है?

CCTNS से प्रधान आरक्षक तक—अकलतरा ही बना कार्यक्षेत्र

शरीफुद्दीन खान के मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उन्होंने अकलतरा थाना में अलग-अलग भूमिकाओं में लंबा समय बिताया।

पहले आरक्षक, फिर CCTNS प्रभारी और वर्तमान में प्रधान आरक्षक।

अर्थात जिम्मेदारियां बदलती गईं, पद बदलता गया, लेकिन अकलतरा थाना से उनका जुड़ाव लगातार बना रहा।

यही स्थिति अब विभागीय पारदर्शिता के लिहाज से चर्चा का विषय बन गई है।

सिस्टम से सवाल—क्या तबादला नीति केवल कागजों तक सीमित है?

पुलिस व्यवस्था में किसी भी कर्मचारी की लंबे समय तक एक ही स्थान पर पदस्थापना को लेकर जनता के बीच कई तरह की धारणाएं बन सकती हैं। इसलिए प्रशासनिक पारदर्शिता के लिए जरूरी है कि ऐसे मामलों में विभाग स्वयं स्थिति स्पष्ट करे।

यदि नौ वर्ष की पदस्थापना नियमसम्मत है, तो विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इसके पीछे कौन-सी प्रशासनिक आवश्यकता है।

यदि रोटेशन या स्थानांतरण की कोई निर्धारित व्यवस्था है, तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि प्रधान आरक्षक शरीफुद्दीन खान की पदस्थापना उस व्यवस्था के तहत कैसे जारी रही।

और यदि नियमों में कोई बाधा नहीं है, तो फिर सवाल यह भी है कि क्या जिले में लंबे समय से एक ही थाने में पदस्थ सभी कर्मचारियों के लिए समान नीति लागू है?

‘स्थायी पता’ बन गया थाना?

अकलतरा में चर्चा का विषय बनी यह पदस्थापना अब एक बड़े प्रशासनिक सवाल में बदलती दिखाई दे रही है।

एक कर्मचारी के लिए नौ साल तक एक ही थाना कार्यस्थल बना रहना क्या महज संयोग है?

या फिर विभागीय व्यवस्था में ऐसी कोई विशेष प्रशासनिक आवश्यकता है, जिसकी जानकारी आम लोगों को नहीं है?

सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पुलिस विभाग में निष्पक्षता केवल दिखाई देनी ही नहीं चाहिए, बल्कि दिखाई भी देनी चाहिए।

फिलहाल अकलतरा में प्रधान आरक्षक शरीफुद्दीन खान की करीब नौ साल की लगातार पदस्थापना को लेकर सूत्रों के हवाले से सवाल उठ रहे हैं और निगाहें अब पुलिस विभाग के आला अधिकारियों की ओर हैं कि वे इस मामले में नियम, नीति और प्रशासनिक औचित्य के आधार पर क्या स्पष्टीकरण देते हैं।

क्योंकि सवाल शरीफुद्दीन खान से ज्यादा उस सिस्टम से है, जिसने करीब नौ वर्षों तक एक ही थाना को उनकी पदस्थापना का स्थायी ठिकाना बनाए रखा।


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