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सोंठी का मां मन्नादाई मंदिर: आस्था, सद्भाव और पर्यावरण संरक्षण की मिसाल

400 वर्ष पुरानी प्रतिमा, 827 ज्योति कलश और 3 एकड़ का भव्य परिसर बना आकर्षण

500 श्रद्धालुओं को निःशुल्क स्वास्थ्य सेवा, बलि प्रथा व शराब पर प्रतिबंध

सोंठी (सीपत)। आस्था जब सामाजिक समरसता, जनसेवा और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ती है, तो वह समाज के लिए प्रेरणास्रोत बन जाती है। बिलासपुर जिले से लगभग 35 किलोमीटर दूर कोरबा जिले की सीमा से लगे वनाच्छादित ग्राम सोंठी स्थित मां बगलामुखी मन्नादाई मंदिर इसका अनूठा उदाहरण है। लगभग 400 वर्ष पुरानी मानी जाने वाली मां मन्नादाई की प्राचीन प्रतिमा, श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या, तीन एकड़ में फैला हरियाली से परिपूर्ण मंदिर परिसर और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध लिए गए निर्णयों ने इस धार्मिक स्थल को विशिष्ट पहचान दिलाई है। यहां नवरात्रि में पूजा-अर्चना के साथ धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक सेवा के विविध आयोजन किए जा रहे हैं।

सोंठी पहाड़ से ग्राम तक पहुंची मां मन्नादाई की आस्था

ग्रामीण मान्यताओं के अनुसार, मां मन्नादाई की प्राचीन प्रतिमा लगभग 400 वर्ष पुरानी और स्वयं प्रकट हुई मानी जाती है। मान्यता है कि सोंठी पहाड़ से धामा धुर्वा नामक गोंड बैगा इस प्रतिमा को अपने कंधे पर लेकर आए थे और ग्राम में इसकी स्थापना की थी। प्रारंभ में माता का मंदिर एक छोटी-सी कुटिया के रूप में था, जहां स्थानीय ग्रामीण श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करते थे।

समय के साथ ग्रामवासियों की आस्था और सामूहिक सहयोग ने इस छोटे से धार्मिक स्थल को भव्य स्वरूप प्रदान किया। वर्ष 2022 में ग्रामीणों ने आपसी चंदे और श्रमदान से मंदिर का नवनिर्माण कराया। इसके साथ ही ज्योति कक्ष और लगभग तीन एकड़ क्षेत्र में विस्तृत परिसर विकसित किया गया। सामूहिक सहभागिता से तैयार यह मंदिर आज धार्मिक आस्था के साथ ग्रामीण एकजुटता का भी प्रतीक बन चुका है।

60 ज्योति कलश से 827 तक पहुंचा श्रद्धा का विस्तार

मंदिर के विकास के साथ श्रद्धालुओं की संख्या और धार्मिक गतिविधियों में भी निरंतर वृद्धि हुई है। वर्ष 2022 में मंदिर निर्माण के समय यहां केवल 60 ज्योति कलश प्रज्वलित किए गए थे, लेकिन इस वर्ष नवरात्रि में इनकी संख्या बढ़कर 827 हो गई है। इनमें 14 घृत ज्योति और 813 तेल ज्योति शामिल हैं। ज्योति कक्ष में प्रज्वलित इन कलशों से मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण से आलोकित हो रहा है।

पहले मंदिर की जानकारी मुख्यतः आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित थी, लेकिन भव्य मंदिर के निर्माण के बाद इसकी ख्याति बिलासपुर के साथ-साथ कोरबा, जांजगीर-चांपा, सक्ती और मुंगेली जिलों तक फैल गई है। अब आसपास के जिलों से भी श्रद्धालु परिवार सहित माता के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं।

नवरात्रि में धार्मिक आयोजनों के साथ जनसेवा की पहल

शारदीय नवरात्रि के अवसर पर मंदिर में धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों की विशेष धूम है। नवरात्रि के प्रथम दिवस हजारों महिलाओं और पुरुषों ने बाजे-गाजे के साथ भव्य कलश यात्रा निकाली। दूसरे दिन झांकी और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ जगराता आयोजित किया गया। इन आयोजनों में ग्रामीणों और श्रद्धालुओं की उत्साहपूर्ण भागीदारी देखने को मिली।

नवरात्रि के तीसरे दिन शासकीय आयुर्वेदिक औषधालय खम्हरिया के सौजन्य से निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर लगाया गया। शिविर में लगभग 500 श्रद्धालुओं और ग्रामवासियों ने स्वास्थ्य परीक्षण एवं उपचार का लाभ लिया तथा निःशुल्क दवाइयां प्राप्त कीं। धार्मिक आयोजन के साथ स्वास्थ्य सेवा को जोड़ने की यह पहल मंदिर की सामाजिक उपयोगिता को रेखांकित करती है।

समिति की ओर से नवरात्रि के अंतिम दिवस सामूहिक भंडारे का आयोजन भी किया जाता है, जिसमें ग्रामवासी मिलकर भोजन तैयार करते हैं। इस प्रकार मंदिर में पूजा-पाठ के साथ सामूहिक सहभागिता और सेवा की परंपरा को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है।

बलि प्रथा पर रोक, अंधविश्वास से दूरी और सामाजिक समरसता पर जोर

मां मन्नादाई मंदिर की विशेष पहचान इसकी सामाजिक सुधार की पहल है। मंदिर का संचालन पंजीकृत मां मन्नादाई सेवा समिति द्वारा किया जाता है। समिति के अध्यक्ष रामेश्वर जायसवाल के मार्गदर्शन में ग्रामवासी मंदिर की व्यवस्था और विभिन्न आयोजनों में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।

रामेश्वर जायसवाल के अनुसार, मंदिर को अंधविश्वास से मुक्त रखते हुए आस्था को सकारात्मक सामाजिक बदलाव से जोड़ना समिति का प्रमुख उद्देश्य है। उन्होंने बताया कि मंदिर में पहले बलि प्रथा प्रचलित थी, लेकिन वर्ष 2022 से इस पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है। मंदिर परिसर में शराब पीकर प्रवेश करना भी निषिद्ध है।

मंदिर में जातिगत भेदभाव और छुआछूत के लिए कोई स्थान नहीं है। समाज के सभी वर्गों के लोग यहां सेवा कार्यों में भाग लेते हैं। धार्मिक आयोजनों से लेकर स्वच्छता, वृक्षारोपण और भंडारे की तैयारियों तक महिला और पुरुष समान उत्साह से योगदान देते हैं। समिति की यह कार्यशैली सामाजिक समरसता और सामूहिक जिम्मेदारी का संदेश देती है।

तीन एकड़ में विकसित ‘माता की बगिया’, पर्यावरण संरक्षण का संदेश

मंदिर परिसर केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि पर्यावरण के प्रति जागरूकता का केंद्र भी है। लगभग तीन एकड़ में फैले परिसर में ‘माता की बगिया’ विकसित की गई है, जहां औषधीय गुणों वाले पौधों के साथ विभिन्न प्रकार के फूलदार पौधे लगाए गए हैं। ग्रामवासी समय-समय पर श्रमदान कर पौधों की देखभाल, वृक्षारोपण और बगिया की साफ-सफाई करते हैं।

वनाच्छादित क्षेत्र में स्थित मंदिर का शांत वातावरण श्रद्धालुओं को प्राकृतिक सौंदर्य के बीच आध्यात्मिक शांति का अनुभव कराता है। मंदिर परिसर में हरियाली को सहेजने और उसे विकसित करने के प्रयास यह संदेश देते हैं कि धार्मिक आस्था के साथ प्रकृति की रक्षा भी सामूहिक दायित्व है।

समिति द्वारा समय-समय पर अन्य सामाजिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। चैत्र नवरात्रि में यहां जंवारा बोने की परंपरा है, जबकि शारदीय नवरात्रि में मां मन्नादाई की पूजा के साथ भव्य दुर्गा प्रतिमा की स्थापना की जाती है।

सामूहिक श्रमदान से संवर रहा मंदिर परिसर

मां मन्नादाई मंदिर की व्यवस्था और विकास में समिति के पदाधिकारियों तथा सदस्यों की महत्वपूर्ण भूमिका है। समिति के अध्यक्ष रामेश्वर जायसवाल, उपाध्यक्ष भीम प्रताप सिंह, कोषाध्यक्ष भूपेंद्र तिवारी और सचिव राजकिशोर ठाकुर सहित सदस्य हीरालाल पटेल, श्याम सुंदर पटेल, अशोक जायसवाल, जगदीश जायसवाल, संतोष वैष्णव, प्रीतम सिंह ठाकुर, घनश्याम श्रीवास, भूषण पटेल, महेंद्र चंद्रिकापुरे, मान सिंह पोर्ते, लक्ष्मी नारायण और शिव सिंह सहित अन्य ग्रामीण मंदिर की व्यवस्थाओं में सहयोग करते हैं।

मंदिर में पुजारी पंडित प्रमोद तिवारी तथा बैगा कार्तिक राम मरकाम और किशन मरकाम भी धार्मिक परंपराओं के निर्वहन में अपनी भूमिका निभाते हैं। सामूहिक श्रमदान, नियमित साफ-सफाई और पौधों की देखभाल के माध्यम से ग्रामवासी मंदिर परिसर को व्यवस्थित एवं स्वच्छ बनाए रखने का प्रयास करते हैं।

रामेश्वर जायसवाल पूर्व में बिलासपुर जिले में जिला शिक्षा अधिकारी के पद पर कार्य कर चुके हैं और वर्तमान में जांजगीर जिले में समग्र शिक्षा के जिला मिशन समन्वयक हैं। उनके मार्गदर्शन में समिति और ग्रामीणों की सक्रियता ने मंदिर के धार्मिक एवं सामाजिक स्वरूप को विस्तार देने में योगदान दिया है।

सनातन परंपरा के साथ सामाजिक सद्भाव का संदेश

रामेश्वर जायसवाल का कहना है कि मंदिर के विकास के पीछे मुख्य उद्देश्य सनातन धर्म की रक्षा के साथ समाज में सद्भाव, समरसता और सेवा की भावना को मजबूत करना है। उनका मानना है कि धार्मिक स्थल समाज को जोड़ने, जरूरतमंदों की सहायता करने और लोगों को सकारात्मक दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

सोंठी का मां मन्नादाई मंदिर इसी सोच को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यहां आस्था के साथ स्वास्थ्य सेवा, पर्यावरण संरक्षण, सामूहिक श्रमदान और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध पहल को महत्व दिया जा रहा है। यही कारण है कि मंदिर की पहचान अब केवल एक धार्मिक स्थल तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह ग्रामीण एकजुटता और सामाजिक चेतना का केंद्र भी बन रहा है।

माता के दर्शन के लिए पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को यहां धार्मिक वातावरण के साथ वनांचल की शांति और प्राकृतिक सौंदर्य का अनुभव मिलता है। मां मन्नादाई मंदिर की यह पहल बताती है कि जब धार्मिक आस्था जनसेवा, प्रकृति संरक्षण और सामाजिक समानता से जुड़ती है, तो वह पूरे समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकती है।


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