जांजगीर में संस्कृति और परंपरा का अनूठा संगम: पुरातत्वविदों ने नट समुदाय की परंपराओं को जाना करीब से

जांजगीर-चांपा। भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को समझने और संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल तब देखने को मिली, जब प्रख्यात पुरातत्वविद डॉ. पूजा सक्सेना और संस्कृति शोधकर्ता नीलिमा गुर्जर, छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध साहित्यकार अलका यादव के साथ जांजगीर पहुंचे। इस दौरान उन्होंने न केवल ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विषयों पर संवाद किया, बल्कि ग्रामीण अंचल की जीवंत परंपराओं को भी करीब से समझने का प्रयास किया।
अपने दौरे के दौरान ये सभी विद्वान महंत ग्राम पहुंचे, जहां उन्होंने नट समुदाय के एक पारंपरिक विवाह समारोह में भाग लिया। इस अवसर पर उन्होंने नट जाति की रीति-रिवाज, सामाजिक संरचना, पारंपरिक गीत-संगीत और विवाह संस्कारों का गहन अवलोकन किया। विवाह समारोह में उनकी सहभागिता ने न केवल स्थानीय लोगों को उत्साहित किया, बल्कि शोधकर्ताओं को भी इस समुदाय की सांस्कृतिक समृद्धि को समझने का एक दुर्लभ अवसर प्रदान किया।
डॉ. पूजा सक्सेना, जो पिछले 25 वर्षों से पुरातत्व, कला और संस्कृति के क्षेत्र में सक्रिय हैं, ने इस अनुभव को “जीवंत संस्कृति का उत्कृष्ट उदाहरण” बताया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के प्रत्यक्ष अनुभव किसी भी दस्तावेज़ीकरण से अधिक प्रभावशाली होते हैं और इससे परंपराओं की वास्तविक आत्मा को समझा जा सकता है।
वहीं, नीलिमा गुर्जर ने नट समुदाय की सांस्कृतिक विविधता और उनकी मौखिक परंपराओं की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे समुदायों का अध्ययन भारतीय लोकसंस्कृति की गहराई को उजागर करता है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि इस अनुभव को भविष्य में शोध और दस्तावेज़ीकरण के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा।
साहित्यकार अलका यादव की उपस्थिति ने इस सांस्कृतिक यात्रा को और भी विशेष बना दिया। उन्होंने स्थानीय समाज और बाहरी शोधकर्ताओं के बीच एक सेतु की भूमिका निभाई, जिससे संवाद और समझ का दायरा और विस्तृत हुआ।
यह दौरा इस बात का प्रमाण है कि भारत की सांस्कृतिक विरासत केवल ऐतिहासिक धरोहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि गांवों और जनजातीय समाजों में आज भी जीवंत रूप में विद्यमान है। ऐसे प्रयास न केवल इन परंपराओं के संरक्षण में सहायक हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का सशक्त माध्यम भी बनते हैं।








