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बोर्ड मेरिट विद्यार्थियों के सपनों को लगा ग्रहण!

पहले आईपीएल मैच दिखाने का वादा, फिर सिर्फ 5 छात्रों तक सीमित सुविधा के नाम पर धोखा

शिक्षा विभाग के फैसले पर छात्रों एवं अभिभावकों में भारी निराशा

जांजगीर-चांपा/रायपुर।

छत्तीसगढ़ में 10वीं एवं 12वीं बोर्ड परीक्षा की प्रावीण्य सूची में स्थान प्राप्त करने वाले मेधावी विद्यार्थियों के साथ हुए प्रशासनिक उलटफेर ने पूरे प्रदेश में नाराजगी और आक्रोश का माहौल पैदा कर दिया है। लोक शिक्षण संचालनालय, छत्तीसगढ़ द्वारा 3 मई को जारी सूचना में कहा गया था कि बोर्ड मेरिट सूची में स्थान प्राप्त विद्यार्थियों को 10 मई को मुंबई और बेंगलुरु के बीच होने वाला आईपीएल मैच दिखाया जाएगा। इस घोषणा के बाद प्रदेशभर के विद्यार्थियों में भारी उत्साह देखने को मिला था। कई जिलों के जिला शिक्षा अधिकारियों ने भी विद्यार्थियों को आधिकारिक रूप से इसकी जानकारी दे दी थी।

लेकिन विद्यार्थियों की खुशियां ज्यादा दिन टिक नहीं सकीं। 6 मई को अचानक जारी दूसरी सूचना ने पूरे मामले को विवादों में ला दिया। नए आदेश में कहा गया कि अब केवल 5 विद्यार्थियों को ही यह सुविधा प्रदान की जाएगी। इस फैसले ने उन सैकड़ों मेधावी विद्यार्थियों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया, जिन्हें पहले इस सम्मान और अवसर का भरोसा दिलाया गया था।

विद्यार्थियों में भारी निराशा, पालकों में आक्रोश

पहले सम्मान और प्रोत्साहन का सपना दिखाकर बाद में उसे सीमित कर देना विद्यार्थियों के साथ मानसिक अन्याय माना जा रहा है। जिन बच्चों ने दिन-रात मेहनत कर मेरिट सूची में स्थान बनाया, वे अचानक खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। विद्यार्थियों का कहना है कि जब विभाग को पहले से स्पष्टता नहीं थी, तो इतनी बड़ी घोषणा क्यों की गई?

पालकों ने भी शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इस प्रकार के अव्यवस्थित और विरोधाभासी आदेश न केवल बच्चों का मनोबल तोड़ते हैं, बल्कि शासन-प्रशासन की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिन्ह लगाते हैं।

“प्रोत्साहन” के नाम पर भेदभाव ?

शिक्षा जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि प्रावीण्य सूची में स्थान प्राप्त सभी विद्यार्थियों को आमंत्रित करने की घोषणा की गई थी, तो बाद में केवल 5 विद्यार्थियों तक इसे सीमित करना सीधा-सीधा भेदभाव है। इससे बाकी विद्यार्थियों में हीन भावना उत्पन्न होना स्वाभाविक है।

विशेषज्ञों का मानना है कि मेधावी विद्यार्थियों को सम्मानित करने की नीति पारदर्शी और समान होनी चाहिए। पहले बड़े स्तर पर घोषणा करना और बाद में नियम बदल देना प्रशासनिक अपरिपक्वता को दर्शाता है।

विभागीय लापरवाही या प्रचार की राजनीति?

पूरा घटनाक्रम अब सवालों के घेरे में है। क्या बिना तैयारी के केवल वाहवाही लूटने के लिए यह घोषणा कर दी गई थी? क्या अधिकारियों ने जमीनी व्यवस्था और संख्या का आकलन किए बिना आदेश जारी कर दिया? यदि ऐसा है, तो यह सीधे तौर पर विद्यार्थियों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ माना जाएगा।

शिक्षा विभाग के इस रवैये की प्रदेशभर में आलोचना हो रही है। सोशल मीडिया पर भी लोग इसे “मेधावी छात्रों के सम्मान के नाम पर मजाक” बता रहे हैं। कई अभिभावकों ने कहा कि सरकार और विभाग को यह समझना चाहिए कि बच्चों की भावनाएं कोई प्रयोगशाला नहीं हैं, जहां कभी भी निर्णय बदल दिए जाएं।

जिम्मेदारों पर कार्रवाई की मांग

विद्यार्थियों और पालकों ने मांग की है कि इस पूरे मामले में जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए। साथ ही, जो घोषणा प्रारंभ में की गई थी, उसे पूर्ण रूप से लागू किया जाए ताकि किसी भी विद्यार्थी के साथ अन्याय न हो।

लोगों का कहना है कि मेधावी छात्रों को प्रोत्साहित करने के नाम पर यदि इस प्रकार की अव्यवस्था और भेदभावपूर्ण निर्णय होंगे, तो भविष्य में विद्यार्थियों का विश्वास शासन और शिक्षा व्यवस्था से उठ जाएगा।

प्रदेश के शिक्षा विभाग के लिए यह मामला अब केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि विद्यार्थियों की भावनाओं, विश्वास और सम्मान से जुड़ा गंभीर विषय बन चुका है।


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