जांजगीर-चांपा में आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल, कार्रवाई की पारदर्शिता पर उठ रही उंगलियां!
अकलतरा में आरोपी के फरार होने की चर्चा
पामगढ़ में छापेमारी के दौरान मुखबिर की मौजूदगी पर सवाल
PRO ग्रुप में प्रेस विज्ञप्तियां नहीं आने से बढ़ी संदेह की स्थिति

जांजगीर-चांपा। जिले में अवैध शराब के कारोबार पर प्रभावी अंकुश लगाने की जिम्मेदारी संभालने वाले आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली अब सवालों के घेरे में है। अकलतरा आबकारी वृत्त में शराब से जुड़े एक आरोपी के पकड़े जाने के बाद कथित तौर पर फरार होने की चर्चा से लेकर पामगढ़ वृत्त में छापेमारी के दौरान मुखबिर की भूमिका और विभागीय कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक नहीं किए जाने तक, कई ऐसे मुद्दे सामने आ रहे हैं, जिनकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है। सवाल यह है कि अवैध शराब के विरुद्ध कार्रवाई में विभाग कितनी गंभीरता बरत रहा है और उसकी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
अकलतरा में आरोपी के फरार होने की चर्चा, आखिर क्या है मामला?
सूत्रों के हवाले से अकलतरा आबकारी वृत्त में हाल ही में शराब के एक कथित आरोपी को पकड़े जाने के बाद उसके फरार होने का मामला सामने आने की बात कही जा रही है। यदि यह जानकारी सही है, तो यह विभागीय निगरानी, आरोपी को अभिरक्षा में रखने की व्यवस्था और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही से जुड़ा गंभीर विषय है।
हालांकि, इस मामले में आरोपी की गिरफ्तारी, उसके फरार होने की परिस्थितियों और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है। विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि घटना वास्तव में हुई या नहीं और यदि हुई, तो आरोपी के फरार होने के लिए जिम्मेदार परिस्थितियां क्या थीं।
पामगढ़ में छापेमारी के दौरान मुखबिर की भूमिका पर सवाल
पामगढ़ आबकारी वृत्त में भी छापेमारी और निरीक्षण की कार्रवाई को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सूत्रों का दावा है कि कुछ कार्रवाइयों के दौरान मुखबिर को साथ लेकर निरीक्षण एवं छापेमारी की जा रही है। इस संबंध में यह स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित व्यक्ति की भूमिका क्या थी और कार्रवाई विभागीय नियमों एवं निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप की गई या नहीं।
मुखबिरों से सूचना प्राप्त करना जांच का हिस्सा हो सकता है, लेकिन किसी विशेष कार्रवाई में उनकी मौजूदगी और भूमिका को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब विभाग को तथ्यों के आधार पर देना चाहिए। किसी भी आरोप पर निष्कर्ष निकालने से पहले संबंधित कार्रवाई के दस्तावेजों और परिस्थितियों की जांच जरूरी है।
PRO ग्रुप में प्रेस विज्ञप्तियां क्यों नहीं हो रहीं जारी?
जिला आबकारी विभाग द्वारा कार्रवाई की जानकारी मीडिया तक पहुंचाने के लिए PRO ग्रुप बनाए जाने की बात सामने आई है। इस ग्रुप के माध्यम से पहले विभागीय कार्रवाई से संबंधित प्रेस विज्ञप्तियां साझा किए जाने की जानकारी है। लेकिन सूत्रों का कहना है कि नए जिला आबकारी अधिकारी के पदभार संभालने के बाद से इस ग्रुप में कार्रवाई से संबंधित प्रेस विज्ञप्तियां नियमित रूप से जारी नहीं की जा रही हैं।
यदि विभाग अवैध शराब के विरुद्ध लगातार कार्रवाई कर रहा है, तो उसकी जानकारी सार्वजनिक करने में संकोच क्यों होना चाहिए? प्रेस विज्ञप्तियों के अभाव में मीडिया और आम नागरिकों को विभाग की कार्रवाई, जब्ती, दर्ज प्रकरणों तथा आरोपियों के विरुद्ध की गई कानूनी कार्रवाई की समुचित जानकारी नहीं मिल पाती।
यहां सवाल केवल प्रेस विज्ञप्ति जारी करने का नहीं, बल्कि सार्वजनिक जवाबदेही और विभागीय पारदर्शिता का भी है। विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि प्रेस विज्ञप्तियां जारी करने की व्यवस्था में बदलाव किया गया है या इसके पीछे कोई अन्य प्रशासनिक कारण है।
कथित लेनदेन के आरोपों की निष्पक्ष जांच जरूरी
सूत्रों के स्तर पर यह आरोप भी लगाए जा रहे हैं कि कुछ आबकारी मामलों में कथित लेनदेन के बाद आरोपियों को छोड़ दिए जाने की आशंका है। हालांकि, इन आरोपों के समर्थन में फिलहाल कोई दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन्हें प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता।
फिर भी, यदि ऐसे आरोप सामने आ रहे हैं, तो संबंधित मामलों के रिकॉर्ड, जब्ती पंचनामे, अपराध पंजीयन, आरोपियों की गिरफ्तारी और रिहाई से संबंधित दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए। इससे स्पष्ट हो सकेगा कि कार्रवाई नियमानुसार हुई या कहीं प्रक्रियागत अनियमितता बरती गई।
अवैध शराब के कारोबार पर नियंत्रण के लिए जिम्मेदार विभाग की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता बनाए रखना जरूरी है। किसी भी अधिकारी या कर्मचारी पर आरोप सिद्ध होने से पहले उसे दोषी ठहराना उचित नहीं, लेकिन गंभीर शिकायतों की अनदेखी करना भी जनहित में नहीं होगा।
जिम्मेदार अधिकारी के आचरण को लेकर भी उठे सवाल
जिला आबकारी विभाग के एक जिम्मेदार अधिकारी के व्यक्तिगत आचरण को लेकर भी सूत्रों के हवाले से कुछ दावे किए जा रहे हैं। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और न ही इनके आधार पर किसी नशे के सेवन या अन्य अनुचित गतिविधि का निष्कर्ष निकाला जा सकता है।
यदि संबंधित अधिकारी के आचरण या ड्यूटी के दौरान किसी प्रतिबंधित अथवा अनुचित गतिविधि में संलिप्तता को लेकर कोई ठोस शिकायत है, तो सक्षम अधिकारी तथ्यों के आधार पर जांच करा सकते हैं। किसी भी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को प्रभावित करने वाले आरोपों की पुष्टि बिना प्रमाण के नहीं की जानी चाहिए।
दूसरे वृत्त के अधिकारी दूसरे क्षेत्र में क्यों कर रहे कार्रवाई?
सूत्रों के अनुसार, जिले के एक आबकारी वृत्त में पदस्थ अधिकारी दूसरे वृत्त के क्षेत्र में होने वाली छापेमारी में भी शामिल हो रहे हैं। यदि ऐसा हो रहा है, तो यह जानना जरूरी है कि संबंधित अधिकारियों को इसके लिए सक्षम स्तर से अधिकृत किया गया है या नहीं।
अंतर-वृत्तीय कार्रवाई प्रशासनिक आवश्यकता के तहत की जा सकती है, लेकिन ऐसी स्थिति में कार्रवाई का आदेश, संबंधित अधिकारियों की भूमिका और जिम्मेदारी स्पष्ट होनी चाहिए। इससे न केवल भ्रम की स्थिति दूर होगी, बल्कि किसी भी कार्रवाई को लेकर उठने वाले संदेहों का समाधान भी हो सकेगा।
जवाबदेही तय करने के लिए जांच जरूरी
जांजगीर-चांपा जिले में अवैध शराब के कारोबार पर प्रभावी नियंत्रण के लिए आबकारी विभाग की सक्रियता और पारदर्शिता दोनों जरूरी हैं। अकलतरा में आरोपी के कथित तौर पर फरार होने, पामगढ़ में छापेमारी की प्रक्रिया, प्रेस विज्ञप्तियों के नियमित प्रकाशन में कमी और अन्य शिकायतों की वास्तविकता सामने लाने के लिए विभागीय रिकॉर्ड की समीक्षा की जानी चाहिए।
अब प्रमुख सवाल यह है कि जिला आबकारी विभाग इन शिकायतों पर क्या स्पष्टीकरण देता है? क्या संबंधित मामलों की जांच कराई जाएगी? क्या कार्रवाई से संबंधित जानकारी मीडिया और आम जनता के लिए नियमित रूप से उपलब्ध कराई जाएगी? और यदि जांच में कोई अनियमितता सामने आती है, तो क्या जिम्मेदारी तय कर नियमानुसार कार्रवाई होगी?
इन सवालों का जवाब विभाग की ओर से आधिकारिक पक्ष सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा। फिलहाल, मामले में निष्पक्ष जांच और पारदर्शी स्पष्टीकरण की आवश्यकता है।








