दमोह में राष्ट्रीय स्तर की 10 दिवसीय कार्यशाला का आयोजन
जांजगीर जिले से शिक्षिका अर्चना शर्मा हुए शामिल

दमोह (मध्य प्रदेश)।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अंतर्गत विद्यालयी शिक्षा को अधिक रोचक, रचनात्मक और सार्थक बनाने के उद्देश्य से “विद्यालय शिक्षा में हस्तकला कौशल का समावेश” विषय पर सीसीआरटी (सेंटर फॉर कल्चरल रिसोर्सेज एंड ट्रेनिंग) सांस्कृतिक स्रोत एवं प्रशिक्षण केंद्र, दमोह (म.प्र.) में राष्ट्रीय स्तर की 10 दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। यह कार्यशाला 4 जनवरी से 13 जनवरी 2026 तक संचालित होगी।
इस कार्यशाला में देश के चार राज्यों — छत्तीसगढ़, सिक्किम, राजस्थान और कश्मीर — से कुल 32 प्रतिभागी शिक्षक-शिक्षिकाएं भाग ले रहे हैं। छत्तीसगढ़ राज्य का प्रतिनिधित्व करते हुए जांजगीर-चांपा जिले से तीन तथा कोरबा जिले से चार शिक्षक-शिक्षिकाएं इस प्रशिक्षण में शामिल हुए हैं।

जांजगीर-चांपा जिले से प्रतिभागियों में
श्रीमती अर्चना शर्मा, राज्यपाल पुरस्कार से सम्मानित शिक्षिका, पूर्व माध्यमिक शाला अकलतरा
उदय कुमार देवांगन, मुख्यमंत्री गौरव अलंकरण से सम्मानित शिक्षक, पूर्व माध्यमिक शाला बालपुर, बलौदा
योगेंद्र बंजारे, शिक्षक, पूर्व माध्यमिक शाला कटरा, बलौदा
वहीं कोरबा जिले से
संतोष कर्ष, मुख्यमंत्री गौरव अलंकरण से सम्मानित सहायक शिक्षक, प्राथमिक शाला कारीछापर, पाली
गोविंद राम देवांगन, व्याख्याता, हायर सेकेंडरी स्कूल माखनपुर, पाली
लव कुमार चौहान, सहायक शिक्षक, प्राथमिक शाला रामपुर, कोरबा
श्रीमती झरना राठौर, शिक्षिका, प्राथमिक शाला उमरेली, करतला
कार्यशाला में सक्रिय सहभागिता निभा रहे हैं।
कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य विद्यालयी शिक्षा में हस्तकला एवं कला आधारित शिक्षण को बढ़ावा देना है, ताकि बच्चों के लिए सीखने की प्रक्रिया अधिक सहज, रुचिकर और व्यवहारिक बन सके। प्रशिक्षण के दौरान विशेषज्ञों द्वारा चित्रकला, मूर्तिकला, काष्ठकला, धातुकला, साहित्य, गीत, संगीत और नाटक जैसी विभिन्न कलाओं के शैक्षिक उपयोग पर व्याख्यान एवं प्रायोगिक प्रदर्शन किए जा रहे हैं।
सीसीआरटी द्वारा आयोजित इस कार्यशाला में प्रतिभागियों को ऐतिहासिक महत्व के स्थलों एवं संग्रहालयों का भ्रमण भी कराया जा रहा है, जिससे वे भारत की समृद्ध कला, संस्कृति और सांस्कृतिक विरासत से प्रत्यक्ष रूप से परिचित हो सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान सोशल मीडिया युग में बच्चे धीरे-धीरे अपनी पारंपरिक कला एवं संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं। ऐसे में कला आधारित शिक्षण पद्धति बच्चों में सांस्कृतिक चेतना विकसित करने और रचनात्मक क्षमताओं को निखारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
प्रशिक्षण के दौरान विभिन्न राज्यों से आए प्रतिभागी शिक्षक आपस में अपनी संस्कृति, सभ्यता, कला और क्षेत्रीय भाषाओं का आदान-प्रदान कर रहे हैं, जिससे राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक समरसता को भी बल मिल रहा है। कार्यशाला में यह भी बताया गया कि किस प्रकार विभिन्न राज्यों की हस्तकलाओं को गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, भाषा, पर्यावरण अध्ययन जैसे विषयों से जोड़कर शिक्षण प्रक्रिया को सरल और प्रभावी बनाया जा सकता है।
कार्यशाला के समापन पर सभी प्रतिभागियों को कला आधारित शिक्षण किट प्रदान की जाएगी, जिसका उपयोग वे अपने-अपने विद्यालयों में बच्चों के बीच कला एवं संस्कृति के प्रति रुचि जागृत करने तथा शिक्षण को अधिक प्रभावी बनाने में कर सकेंगे।
कुल मिलाकर, यह राष्ट्रीय स्तर की कार्यशाला न केवल शिक्षकों के व्यावसायिक विकास में सहायक सिद्ध हो रही है, बल्कि विद्यालयी शिक्षा में भारतीय कला और संस्कृति के पुनर्स्थापन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी मानी जा रही है।








