जैन समाज अकलतरा द्वारा चातुर्मास मंगल कलश स्थापना का पावन पर्व अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया गया
भव्य शोभायात्रा से गूंजा नगर, देशभर से उमड़े श्रद्धालु

अकलतरा। जैन समाज अकलतरा द्वारा चातुर्मास मंगल कलश स्थापना का पावन पर्व अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर नगर में भव्य एवं आकर्षक शोभायात्रा निकाली गई, जिसमें धर्म, संस्कृति और आस्था का अनुपम संगम देखने को मिला। शोभायात्रा के दौरान पूरा नगर "जिनेन्द्र भगवान की जय" के जयघोष, भक्ति गीतों और मंगल ध्वनियों से गुंजायमान हो उठा। देश के विभिन्न राज्यों एवं शहरों से पहुंचे हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने इस धार्मिक आयोजन को ऐतिहासिक स्वरूप प्रदान किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ नगर के जैन मंदिर से हुआ, जहां निर्यापक श्रवण मुनि श्री 108 प्रसाद सागर महाराज, मुनिश्री 108 शीतल सागर महाराज तथा मध्यप्रदेश के अशोकनगर से पधारे देश के सुप्रसिद्ध प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्रह्मचारी प्रदीप भैया के मंगल सानिध्य में शोभायात्रा प्रारंभ हुई। गाजे-बाजे, आकर्षक धार्मिक झांकियों एवं पारंपरिक वेशभूषा में सुसज्जित श्रद्धालुओं ने नगरवासियों का मन मोह लिया।
महिलाएं सिर पर मंगल कलश धारण कर भक्ति भाव से शोभायात्रा की शोभा बढ़ा रही थीं, वहीं युवा एवं बच्चे धार्मिक ध्वज लेकर अनुशासित ढंग से यात्रा में शामिल हुए। भक्ति गीतों की मधुर स्वर लहरियों और धार्मिक वातावरण ने पूरे नगर को आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर कर दिया।
शोभायात्रा नगर के प्रमुख मार्गों बजरंग चौक, शास्त्री चौक, सब्जी मार्केट रोड एवं भगवान परशुराम चौक से होते हुए जानकीलाल लिखमानिया धर्मशाला परिसर पहुंची, जहां चातुर्मास मंगल कलश स्थापना एवं विशाल धर्मसभा का आयोजन किया गया।
चातुर्मास आत्मशुद्धि और धर्म साधना का श्रेष्ठ अवसर : मुनिश्री 108 प्रसाद सागर महाराज
धर्मसभा को संबोधित करते हुए निर्यापक श्रवण मुनि श्री 108 प्रसाद सागर महाराज ने कहा कि अकलतरा को पूरे भारतवर्ष में धार्मिक नगरी के रूप में विशेष पहचान प्राप्त है। यहां के श्रद्धालुओं के महान पुण्यों के प्रभाव से नगर को पुनः चातुर्मास का यह पावन अवसर प्राप्त हुआ है।
उन्होंने कहा कि चातुर्मास केवल वर्षा ऋतु में एक स्थान पर निवास करने की परंपरा नहीं है, बल्कि यह आत्मशुद्धि, संयम, तप, स्वाध्याय और धर्म साधना का सर्वोत्तम काल है। इस अवधि में धर्म आराधना, पूजा, स्वाध्याय, दान एवं सदाचार का पालन करने से आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। मंगल कलश स्थापना शुभता, समृद्धि, शांति एवं धर्म के प्रति अटूट आस्था का प्रतीक है तथा समाज में संस्कार, सद्भाव और नैतिक मूल्यों को सुदृढ़ करने का संदेश देती है।
सादगी और अहिंसा ही वास्तविक सौंदर्य : मुनिश्री 108 शीतल सागर महाराज
अपने प्रेरक उद्बोधन में मुनिश्री 108 शीतल सागर महाराज ने आधुनिक जीवनशैली एवं सौंदर्य प्रसाधनों के बढ़ते उपयोग पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज बाजार में उपलब्ध अनेक प्रसाधनों में ऐसे रासायनिक तत्व एवं जीव हिंसा से जुड़े पदार्थ भी हो सकते हैं, जिनका उपयोग स्वास्थ्य एवं अहिंसा दोनों दृष्टियों से उचित नहीं है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि किसी भी सौंदर्य प्रसाधन का उपयोग करने से पूर्व उसकी गुणवत्ता, शुद्धता एवं निर्माण प्रक्रिया की जानकारी अवश्य प्राप्त करें तथा यथासंभव प्राकृतिक एवं अहिंसा के सिद्धांतों के अनुरूप निर्मित उत्पादों का ही प्रयोग करें। उन्होंने कहा कि बाहरी सजावट से कहीं अधिक महत्वपूर्ण मन, वचन और कर्म की पवित्रता है। संयमित एवं सादगीपूर्ण जीवन ही वास्तविक सौंदर्य का आधार है।
धर्मसभा में मिला आत्मचिंतन और सदाचार का संदेश
धर्मसभा के दौरान मुनिराजों ने श्रद्धालुओं को संयम, सदाचार, आत्मचिंतन एवं धार्मिक संस्कारों को जीवन में अपनाने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि चातुर्मास का प्रत्येक दिन आत्मकल्याण का अमूल्य अवसर है, जिसका सदुपयोग धर्म आराधना, सेवा, तप, स्वाध्याय एवं आत्मानुशासन के माध्यम से किया जाना चाहिए।
इन परिवारों को प्राप्त हुआ मंगल कलश स्थापना का सौभाग्य
चातुर्मास के प्रथम मंगल कलश स्थापना का सौभाग्य देवेंद्र जैन, सुमनलता जैन, अंशुल जैन एवं क्षिपा जैन परिवार (बिलासपुर) को प्राप्त हुआ।
द्वितीय मंगल कलश स्थापना का सौभाग्य राजेंद्र जैन, स्वप्निल जैन, रितेश जैन, वंदना जैन एवं रीत जैन परिवार को मिला।
तृतीय मंगल कलश स्थापना का सौभाग्य मंगलचंद जैन एवं पवन कुमार जैन परिवार को प्राप्त हुआ।
देशभर से पहुंचे श्रद्धालु
इस भव्य धार्मिक आयोजन में बिलासपुर, कोरबा, नैला, बलौदाबाजार, बलोदा, भाटापारा, तिल्दा, पेंड्रा, रायपुर, दुर्ग, डोंगरगढ़, जबलपुर, नागपुर, भोपाल सहित देश के विभिन्न शहरों से बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रद्धालु शामिल हुए। सभी ने चातुर्मास के प्रथम दिवस पर आयोजित मंगल कलश स्थापना एवं धर्मसभा में सहभागिता कर धर्मलाभ प्राप्त किया।
धार्मिक आस्था, अनुशासन, भक्ति और सामाजिक समरसता का यह आयोजन अकलतरा की धार्मिक पहचान को और अधिक गौरवान्वित करने वाला सिद्ध हुआ। पूरे नगर में दिनभर भक्तिमय वातावरण बना रहा तथा श्रद्धालुओं ने इसे जीवन के अविस्मरणीय आध्यात्मिक अनुभवों में से एक बताया।








