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49 जिंदा कुओं के शहर अकलतरा नगर में पानी की भारी किल्लत

जिम्मेदारों के आपसी अंतर्कलह से पूरे नगर में पानी की समस्या से जूझ रही नगर की जनता

विफल रणनिति से जिम्मेदारों की हो रही किरकिरी

शिक्षक रमाकांत सिंह ने कुंओं के पानी का उपयोग कर समस्या समाधान का दिया मंत्र

अकलतरा। कभी अपने पारंपरिक जल स्रोतों और दर्जनों जीवंत कुओं के लिए पहचान रखने वाला अकलतरा नगर आज भीषण पेयजल संकट से जूझ रहा है। विडंबना यह है कि जिस नगर में आज भी 49 से अधिक जिंदा कुएं मौजूद हैं, वहीं हजारों नागरिक पीने के पानी के लिए परेशान हैं। नगर के अनेक वार्डों में नियमित जलापूर्ति बाधित होने से लोगों को दूर-दूर से पानी लाना पड़ रहा है, जबकि गर्मी के इस मौसम में पानी की मांग लगातार बढ़ती जा रही है।

नगरवासियों का कहना है कि पेयजल संकट केवल प्राकृतिक कारणों का परिणाम नहीं है, बल्कि जिम्मेदार विभागों और जनप्रतिनिधियों के बीच समन्वय की कमी तथा प्रभावी रणनीति के अभाव ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। कई क्षेत्रों में पानी की आपूर्ति अनियमित है, जिससे नागरिकों में असंतोष बढ़ता जा रहा है।

49 जिंदा कुओं का सर्वेक्षण बना चर्चा का विषय

इसी बीच अकलतरा के शिक्षक एवं सामाजिक सरोकारों से जुड़े रमाकांत सिंह द्वारा नगर के 49 जीवंत कुओं का विस्तृत सर्वेक्षण किए जाने की जानकारी सामने आई है। सर्वेक्षण में यह पाया गया कि नगर के अनेक पुराने कुएं आज भी पर्याप्त जल उपलब्ध कराने की क्षमता रखते हैं और संकट की घड़ी में इन्हें वैकल्पिक जल स्रोत के रूप में उपयोग किया जा सकता है।

रमाकांत सिंह का मानना है कि यदि प्रशासन, नगर पालिका और नागरिक मिलकर इन कुओं के संरक्षण, सफाई और उपयोग की दिशा में पहल करें तो वर्तमान जल संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है। उन्होंने नगरवासियों से अपील की है कि पारंपरिक जल स्रोतों को बचाने और उनका उपयोग बढ़ाने के लिए सामूहिक प्रयास किए जाएं।

अंतर्कलह का खामियाजा भुगत रही जनता

नगर में चर्चा है कि जिम्मेदारों के बीच बेहतर तालमेल और दूरदर्शी योजना के अभाव का सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ रहा है। जल संकट से निपटने के लिए समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए जाने के कारण स्थिति लगातार बिगड़ती गई। कई वार्डों में लोगों को घंटों इंतजार के बाद भी पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि नगर के पुराने कुएं, तालाब और भूजल संरक्षण की परंपरागत व्यवस्थाएं यदि समय रहते संरक्षित की जातीं तो आज यह स्थिति उत्पन्न नहीं होती। अकलतरा जैसे नगर, जहां ऐतिहासिक रूप से जल स्रोतों की समृद्ध परंपरा रही है, वहां पानी की किल्लत चिंता का विषय बन गई है।

पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण की आवश्यकता

पर्यावरणविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि जल संकट का स्थायी समाधान केवल टैंकरों या अस्थायी व्यवस्थाओं से संभव नहीं है। वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, कुओं की नियमित सफाई और पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण पर विशेष ध्यान देना होगा।

अकलतरा के 49 जिंदा कुएं केवल जल स्रोत नहीं, बल्कि नगर की ऐतिहासिक धरोहर भी हैं। यदि इनका वैज्ञानिक तरीके से उपयोग और संरक्षण किया जाए तो आने वाले वर्षों में जल संकट की समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

प्रशासन से ठोस पहल की अपेक्षा

नगरवासियों ने प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से मांग की है कि पेयजल संकट के समाधान के लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाए जाएं। साथ ही रमाकांत सिंह द्वारा किए गए सर्वेक्षण का अध्ययन कर कुओं के पानी को आपूर्ति व्यवस्था से जोड़ने की संभावनाओं पर भी विचार किया जाए।

गर्मी के इस दौर में अकलतरा की जनता एक ही सवाल पूछ रही है—जब नगर में 49 जिंदा कुएं मौजूद हैं, तो फिर लोगों को पानी के लिए क्यों भटकना पड़ रहा है? यह सवाल न केवल जिम्मेदारों की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है, बल्कि जल प्रबंधन की मौजूदा व्यवस्था की भी गंभीर समीक्षा की मांग करता है।


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